“अनामिका मेरी मम्मा थीं… लेकिन अब वो तारा बन गई हैं।”
इस एक वाक्य ने शिव की दुनिया एक बार फिर से बदल दी थी। उसकी आंखों के सामने वही रात घूम गई — जब उसने अनामिका को अपने सीने से लगाकर वादा किया था कि वो हमेशा उसका रहेगा।
उस बच्ची की आँखें… हूबहू अनामिका की थीं।
“तुम्हारा नाम क्या है?” शिव ने कांपती आवाज़ में पूछा।
“आरु,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मम्मा कहती थीं, ये नाम ‘अनामिका’ के दिल से निकला है।”
शिव चुप था। उसका कलेजा भीग चुका था। क्या अनामिका उसकी ज़िंदगी से अचानक नहीं, बल्कि एक नन्हीं निशानी के साथ गई थी?
शिव ने उस बच्ची को कुछ देर लाइब्रेरी में बैठाया और पूछा, “तुम किसके साथ आई हो?”
“मैं मौसी के साथ रहती हूँ,” आरु ने बताया। “लेकिन मम्मा की किताबें मुझे बहुत पसंद हैं, तो मौसी मुझे यहाँ लाती हैं।”
शिव ने आरु की मौसी से बात की। वो जानती थी शिव कौन है।
“अनामिका ने जाते-जाते मुझे सब कुछ सौंपा था,” उसने बताया। “वो जानती थी कि ये बच्ची तुम्हारी है, लेकिन तुम्हें बताकर तुम्हारी ज़िंदगी बाँधना नहीं चाहती थी।”
शिव सन्न रह गया।
“मेरी… बेटी?” उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। “उसने मुझसे क्यों छुपाया?”
“क्योंकि वो तुमसे प्यार करती थी। और तुम्हें कैद नहीं करना चाहती थी।”
शिव ने उस दिन आरु को गले से लगाया, जैसे उसने अनामिका को दोबारा पा लिया हो।
शिव ने अब लाइब्रेरी की नौकरी के साथ-साथ आरु की देखभाल शुरू कर दी। उसकी पढ़ाई, उसकी हंसी, उसके सवाल — हर चीज़ में उसे अनामिका का अक्स दिखता।
आरु भी जल्दी ही शिव के बहुत करीब हो गई।
“पापा…,” एक दिन उसने पहली बार पुकारा।
शिव की आंखें नम हो गईं। उसने आरु को सीने से लगाया।
“मैं हूँ, हमेशा तुम्हारा पापा रहूँगा।”
उस दिन, जैसे अनामिका ने ऊपर से मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया हो।
एक दिन आरु ने खेलते-खेलते पुरानी अलमारी से एक डायरी निकाल ली — अनामिका की।
शिव ने कांपते हाथों से उसे खोला।
"प्रिय शिव,
अगर ये डायरी तुम्हारे हाथ लगे, तो समझना कि मेरी ज़िंदगी की आखिरी सांसें तेरे नाम थीं।
तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी मासूमियत… और वो एक रात जब हमने खुद को खो दिया — उस एक रात ने मुझे मेरी दुनिया दी — हमारी आरु।
मैं डरती रही, बताने से… लेकिन तुम जान लो, वो तुम्हारे ही दिल की धड़कन है।
उसका ख्याल रखना। और अगर तुम्हारे दिल में जगह हो… तो किसी दिन उसे बता देना कि उसकी माँ ने अपने आखिरी ख्वाब में सिर्फ़ तुम्हें देखा था।
तुम्हारी —
अनामिका"
शिव फूट-फूटकर रो पड़ा।
वो डायरी… जैसे उसके सीने को चीर गई थी।
शिव अब 26 का हो चुका था। उसने खुद को एक अच्छा शिक्षक बना लिया था, और आरु को एक बेहतर ज़िंदगी देने का हर मुमकिन प्रयास कर रहा था।
हर साल अनामिका की बरसी पर, वो और आरु उस लाइब्रेरी की खिड़की के पास बैठते — वही जगह जहाँ वो पहली बार मिले थे।
एक दिन आरु ने पूछा, “क्या मम्मा आपसे बहुत प्यार करती थीं?”
शिव ने हंसते हुए कहा, “इतना कि आज भी वो मुझे छोड़ कर नहीं गईं… वो हर रोज़ तुम्हारी आंखों से मुझे देखती हैं।”
आरु उसकी गोद में सर रखकर सो गई।
शिव ने खिड़की से आसमान की ओर देखा — और एक तारा टिमटिमा रहा था।
वो जानता था — अनामिका अब भी उसके साथ थी।
NEXT part- उस पार का प्यार-3
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