उस पार का प्यार

 शिव, 18 साल का एक लड़का, कॉलेज का पहला साल शुरू कर रहा था। छोटा शहर, सादा जीवन और एक जिज्ञासु दिल। वो ज़्यादा नहीं बोलता था, लेकिन उसकी आंखें जैसे सब कुछ कह जाती थीं।

शिव के पापा शहर की एक पुरानी लाइब्रेरी में चौकीदार थे, और गर्मियों की छुट्टियों में वह भी वहीं मदद करता था। किताबों के बीच उसकी दुनिया थी — प्रेम कहानियों से लेकर दार्शनिक लेखन तक।

उसी लाइब्रेरी में एक दिन आई — अनामिका।

करीब 30 साल की उम्र, गहरी आँखें, एक अलग ठहराव और ऐसा सौंदर्य जिसे शब्दों में पिरोना मुश्किल था। वो रोज़ आती, एक ही कोना चुनती, और देर तक पढ़ती रहती।

शिव उसे चुपचाप देखा करता।

एक दिन हिम्मत जुटा कर वो बोल पड़ा, “मैम, आपको कौन-सी किताबें पसंद हैं?”

अनामिका ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा। “वो जो दिल तोड़ती हैं… और फिर जोड़ भी देती हैं।”

शिव की धड़कनें तेज़ हो गईं।


धीरे-धीरे उनकी बातचीत बढ़ी। किताबों से शुरू हुआ रिश्ता, ज़िंदगी की बातों तक पहुँच गया। शिव उसे हर दिन देखने को बेताब रहता, और अनामिका भी, जिसे पहले अकेलापन घेरता था, अब मुस्कुराने लगी थी।

एक दिन जब बारिश हो रही थी, और लाइब्रेरी में सन्नाटा था, तब अनामिका खिड़की के पास बैठी थी। शिव ने धीरे से पूछा, “आप इतनी चुप क्यों रहती हैं?”

अनामिका ने देखा, उसकी आंखों में सवाल नहीं, फिक्र थी।

“कभी-कभी ज़िंदगी इतनी आवाज़ें देती है कि इंसान चुप रहना सीख जाता है।”

शिव ने उसका हाथ थाम लिया। “तो फिर आप मेरे साथ चलिए, जहां सिर्फ़ खामोशी नहीं, समझ भी होगी।”

उनकी उंगलियां पहली बार मिली थीं — एक अधूरी प्यास को छूकर।



समाज की नजरों में ये रिश्ता अजीब था — 30 साल की औरत और 18 साल का लड़का।

लोग बातें करने लगे, लेकिन शिव को फर्क नहीं पड़ता था। वह हर रोज़ अनामिका के लिए फूल लाता, बारिश में उसके साथ भीगता, और सर्दियों की सुबहों में उसकी उंगलियों को अपने हाथों में लेकर गर्म करता।

अनामिका ने कई बार दूरी बनाने की कोशिश की, लेकिन हर बार शिव का मासूम लेकिन सच्चा प्रेम उसे लौटा लाता।

एक रात, जब दोनों अकेले लाइब्रेरी में थे, और बाहर ज़ोरदार बारिश हो रही थी, शिव ने उसकी आंखों में देखा और कहा, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ, पूरी तरह से, बिना शर्त।”

अनामिका की आंखें भर आईं। “शिव… तुम समझते नहीं। मैं टूटी हुई हूँ। मेरी ज़िंदगी में बहुत कुछ अधूरा है। मैं माँ नहीं बन सकती… मैं तलाकशुदा हूँ… और मैं तुमसे बहुत बड़ी भी।”

शिव ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। “तुम जो भी हो, जैसी भी हो… मैं हर हिस्सा चाहता हूँ। तुम्हारी उम्र नहीं, तुम्हारी आत्मा से प्यार किया है मैंने।”

उस रात, पहली बार, दोनों ने अपनी भावनाओं को पूरी तरह बहने दिया। कोई पर्दा नहीं, कोई झूठ नहीं — सिर्फ़ प्यार और समर्पण।


कई महीनों तक उनका प्यार परवान चढ़ता रहा। लोग अब भी बातें करते, लेकिन अब अनामिका को फर्क नहीं पड़ता था। वो फिर से मुस्कुराने लगी थी, जिंदगी को महसूस करने लगी थी।

फिर एक दिन, अनामिका अचानक गायब हो गई।

फोन बंद, घर खाली, कोई सुराग नहीं।

शिव पागल-सा हो गया। हर जगह ढूंढा, लेकिन उसका नाम तक हवा से गायब हो चुका था।

हफ्तों बीते, फिर महीनों… और फिर एक दिन, अनामिका की एक चिट्ठी उसे मिली — लाइब्रेरी में उसकी पसंदीदा किताब के बीच।


"मेरे शिव,

मुझे माफ़ करना कि मैंने बिना कुछ कहे सब छोड़ दिया। लेकिन मैं तुम्हें तोड़ना नहीं चाहती थी। मुझे ब्लड कैंसर है — अंतिम स्टेज। मैं जानती थी, अगर मैंने तुम्हें बताया, तो तुम अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे दर्द के साथ बाँध देते। मैं नहीं चाहती कि तुम्हारा 18वां साल मेरी मौत के नाम हो जाए।

मैंने तुम्हें चाहा है, हर सांस में, हर धड़कन में… लेकिन अब जब मेरा वक़्त आ गया है, मैं तुम्हें आज़ाद कर रही हूँ। मेरी यादों को संजो लेना, लेकिन उन्हें बोझ मत बनने देना।

तुम्हारा — हमेशा तुम्हारा,
अनामिका"



आज 6 साल बीत चुके हैं। शिव अब 24 का हो गया है। उसने अनामिका की तस्वीर को अपने कमरे की सबसे ऊँची दीवार पर लगाया है।

वो अब भी उसी लाइब्रेरी में काम करता है। रोज़ अनामिका की वही पसंदीदा किताब खोलता है, और उस चिट्ठी को पढ़ता है।

हर बारिश में वो खिड़की के पास बैठकर उसकी याद में भीगता है। कभी-कभी उसे लगता है, जैसे अनामिका अब भी वहाँ बैठी है — वही मुस्कान, वही ठहराव।

एक दिन एक छोटी बच्ची लाइब्रेरी आई, और किताब चुनते हुए बोली, “मम्मा ने कहा है कि ये किताब उनकी सबसे पसंदीदा थी।”

शिव चौंका।

“तुम्हारी मम्मा का नाम क्या है?”

“अनामिका… लेकिन अब वो तारा बन गई हैं।”

शिव की आंखों से आंसू बह निकले।

शायद… प्यार मरता नहीं। वो बस एक रूप से दूसरे रूप में चला जाता है।

Next part- उस पार का प्यार-2

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